Mahisasura Mardini stotra ka arth | महिषासुरमर्दिनि स्तोत्र का अर्थ


महिससुरमर्दिनी स्तोत्र का अर्थ


अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१॥



भावार्थ: हे हिमालय पर्वत की पुत्री (पार्वती) ! धरती को आनंदित करने वाली, संसार को पुलकित करने वाली, नंदी के द्वारा वंदित, पर्वत राज विंध्याचल के शीश पर निवास करने वाली , विष्णु को आनंदित करने वाली । इंद्र के द्वारा पूजित हे भगवति ! आप नील कंठ भगवान शिव की भार्या हैं । आपका कुटुम्ब (परिवार) बहुत विशाल है। आप कल्याण करने वाली हैं । हे महिषासुर दैत्य का अंत करने वाली ! जिनके केश अत्यंत रम्यक (मनोहर) हैं, आप शैल पुत्री हैं । आपकी जय हो । आपकी जय हो।

सुरवर वर्षिणि दुर्धर धर्षिणि दुर्मुख मर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिष मोषिणि घोषरते । दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२॥

 भावार्थ: सुरपति इंद्र को समृद्ध देने वाली। दुर्धर नामक दैत्य या ऐसी बाधा जिसका अंत करना अत्यंत दुष्कर है, का अंत करने वाली। दुर्मुख नामक दैत्य को मरणासन्न करने वाली। तीनो लोको का पालन पोषण  करने वाली।  दोषों का नाश करने वाली। नाद तथा ध्वनियों से युक्त। दानवों का निराकरण करने वाली। दिति के पुत्र अर्थात दैत्यों मारने वाली। मद में लिप्त हुए मनुष्यो को निर्बल करने वाली। समुद्र की पुत्री (देवी लक्ष्मी) । महिषासुर नामक दैत्य का संहार करने वाली, जिनके केश अत्यंत रम्य हैं, जो शैैैल पुत्री हैं, उनकी जय हो। उनकी जय हो। 

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